शीर्षक: “तपस्या बन गया जीवन”
काव्य विधा:-🌺 गीत 🌺
भवन से निकले पग मेरे,
शहर की छोर जा करके।
तपस्या बन गया जीवन!
तपिश सी धूप खा करके।।
वही प्रातः अरुणोदय की,
सुबह और छांव सी धूमिल।
दिखे कुछ अनदिखे ओझल,
समझ से सब रहे ओझल ।।
वही प्रातः महादेव की ,
भक्ति जाग जाती थी।
वही शक्ति प्रभु की मेरे,
प्राणों में समाती थी।।
हवा के वेग से भी तीव्र ,
भंवर बन घूमी जाती थी।
भयंकर आंधी तूफां में,
भी हलचल खूब मचाती थी।।
नहीं विस्मित हुआ है यह ,
पटल पर जाया छा करके।
तपस्या बन गया जीवन,
तपिश सी धूप खा करके।।१।।
शिशु की प्राण वायु में,
प्रणव को देखती है वह।
खनकती है जो चूड़ी तो,
शिशु को झांकती है वह।।
बहुत धीरे से उठती है,
हृदय की मातृ जननी वह।
उसे तिरछी नयन से देख,
सिर पर हांथ रखती है।।
मेरा कान्हा ,तू सो जा अब,
मुझे अब देर होती है।
शिशु के कोमल करतल को,
ये पलकें खूब भिगोती है।।
बड़ा मुश्किल वह पल होता,
हृदय में टीस भर आती।।
करूण क्रंदन किया मैंने,
सरल जीवन तपा करके।।२।।
चली अब भाग में लेने,
सफर की जिंदगानी है ।
लगी है दौड़ जीवन में,
न अपनी कोई रवानी है।।
समय की बेड़ियों में हम,
बंधे और कैसे जकड़े हैं।।
समय है साथ मेरे तो,
समय के साथ सब कुछ है।।
ठहर जाते हैं थककर हम ,
ठहरता है नहीं जीवन।
अजी! यह भूल मत करना,
मचलता है यह पागलपन ।।
अरे! यह नाव तो मेरी,
पड़ी मझधार में ही है।
सफलता की कुशलता में,
मेरी पतवार तू ही है।।
सिसकतीं सी रही आहें,
समय सन्ताप सह करके।
तपस्या बन गया जीवन,
तपिस सी धूप खा करके।।३।।
प्रेषिका;
कवयित्री/लेखिका/साहित्यकार/ शिक्षिका; अन्नपूर्णा मालवीया (सुभाषिनी) संस्कृत (प्रवक्ता)
गौरी पाठशाला इंटर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश।