दार्शनिक एवं संत कवि के रूप में कबीरदास जी: डॉ. प्रभु चौधरी

दार्शनिक एवं संत कवि के रूप में कबीरदासजी
डॉ. प्रभु चौधरी

कबीर साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि ’वस्तुतः जब कबीर निर्गुण भगवान का स्मरण करते हैं तो उनका उद्देश्य यह होता है कि भगवान के गुणमय शरीर की जो कल्पना की गई है वह स्वरूप उन्हें मान्य नहीं है, परंतु निर्गुण से वे एक निषेधात्मक भाव ही ग्रहण करते हो, यह बात भी सही नहीं है। वस्तुतः वे भगवान को सत्व, तमो और रजो गुण से अतीत मानते हैं और इसी गुणातीत रूप को - निर्गुण शब्द में प्रकट करते हैं।’
कबीर का निर्गुण रूप इतना सामर्थ्यवान है कि वह बिना इंद्रियों के और बिना स्वरूप के सृष्टि का संचालन करता है। यही कबीर के दर्शन का मूल आधार है...

’बिन मुख खाई चरण बिन चाले,
बिन जिभ्य गुण गावे।
आछे रहे ठौर नहीं छाडे,
दस दिसिहीं फिरि आवे।।
बिन ताला ताल बजावे,
बिन मंदल पर ताला।
बिनही शबद अनहद बाजे,
तहाँ निरंतर है गोपाला।।’
कबीर ने अपने ब्रह्म को राम, हरी, मुरारी, गोपाल, विष्णु आदि नाम देकर भी निर्गुण निराकार ही माना है।
कबीर के दर्शन में निराकार ब्रह्म की सभी झलकियाँ हैं जैसे निर्गुणोपसना, रहस्यवाद, श्रृंगार का उभयपक्षीय वर्णन, अन्याय का तीव्र विरोध, आडंबर रूढ़ियों का विरोध, लोक कल्याण की भावना, सद्गुरु का स्मरण, सधुक्कड़ी भाषा आदि आदि। कबीर के दर्शन की उपादेयता और मानव कल्याण भावना पर प्रकाश हालते हुए आलोचकों ने कहा है ’भक्ति काव्य का मूल विवेच्य भक्ति ही रहा है, इसलिए हम उसमें आधुनिक कालीन जैसे विषय से साम्य नहीं कर पाते परंतु गाम्भीर्य की दृष्टि से वह आधुनिक काल से अधिक पूर्ण सशक्त, कलात्मक और प्रभावशाली है और यही दृष्टि कबीर को युगदृष्टा और सर्वश्रेष्ठ दर्शनिक बनता है।
कबीर के राम साधना, कबीर का रहस्यवाद, कबीर के काव्य की व्यापकता अंतर्निहित काव्य संदेश, उलटवासिया आदि अन्य कवियों से अलग करता है। कबीर के राम की चर्चा-
’दसरथ सूत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम न जाना।।’
डॉ. श्याम सुंदर दास ने कबीर के राम पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ’कबीर के राम भारतीय ब्रह्म भावना के प्रतिरूप ही हैं, कुछ लोग भ्रमवश समझते नहीं हैं वह ब्राह्य यथार्थमूलक मुसलमानी एकेश्वरवाद या खुदावाद के समर्थक कतई नहीं थे, वे राम को सगुण और निर्गुण दोनों ही मानते हैं, उनके राम बौद्धों के शून्य ब्रह्म के प्रतिरूप हैं।

आचार्य तुलसी ने भी एक जगह कहा है-
जम पखेंन तुम देखन हारे।
विधि हरी शम्भू नचवान वारे।।
सोई न जानेहि मर्म तुम्हारा।
और तुम्हीं को जानन हारा।।
यही रहस्यवाद को प्रेरित भी करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने स्पष्ट किया है कि ’साधना के क्षेत्र में जो अद्वैत है, साहित्य के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है। इसका आशय यह हुआ कि जब साधक की आत्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म से जब प्रेम संबंध स्थापित करने का प्रयत्न करती है और साधक द्वारा उस प्रयत्न या साधना की अभिव्यक्ति की जाती है तब वह वर्णन रहस्यवाद कहलाता है, अस्पष्ट की अभिव्यक्ति रहस्यवाद की मूल विशेषता है।’
कबीर के दर्शन में रहस्यवाद के अनेक रूप मिलते हैं। कभी कबीर अबोध बालक बन जाते हैं और निराकार को जननी बना देते हुए कहते हैं-
हरी जननी मैं बालक तोरा।
कहे न बकसूह अवगुण मोरा।।
दास्य मूलक रहस्यवाद में अत्यंत तुच्छ ब्रह्म के समक्ष उपस्थित होते हुए कहते हैं-
’कबीर कुत्ता राम का मुतिया मेरा नाम।
गले में राम की जेबडी जित खींचे तित जाय।।’
’दुलहिन गावही मंगला चार।
हम घरी आये राम भरतार।।’
कभी स्वयं को नायिका और निराकार को नायक बना देते हैं। रहस्य से भरा गुलदस्ता है।
कबीर के दर्शन में व्यापक संदेश भी है, काव्य की सभी विधाओं पर उनका बहुत ही गहरा और अचूक अधिकार था। आधुनिक काव्य की शैली गजलों पर भी कबीर ने बड़ी शिद्दत से अपना लोहा मनवाया है। हिंदुस्तान ही नहीं अपितु दुनिया की कई देशों में गजल साहित्य की गौरवशाली परंपरा रही है। हिंदुस्तान में सदियों से गजल सभी वर्गों को प्रभावित करती आ रही है। तथापि आम आदमी की पीड़ाओं, कुंठाओं और सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विद्रुपताओं पर जिस शिद्दत के साथ स्वातंत्र्योत्तर काल में कबीर ने अनेक गजलें नज्में कही हैं-
एक मतला और एक शेर देखिए-
हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या?
रहे आजा या जग से हमन दुनिया से यारी क्या?
कबीर इशक का माता, दुई को दूर तक दिल से।
जो चलना राह नाजुक है हमन सर बोझ भरी क्या?
ऐसी ही विलक्षणता उनके दर्शन में उलटवासियों को लेकर भी रही है। उलटी कह कर सीधा समझना उनकी विशिष्ट शैली रही है-
है कोई जगत गुरु ज्ञानी, उलटी बात बुझे।
पानी में अग्नि जरे, अंधेरे को सूझे ।।

या फिर
गाय नाहर खायो, हरणी खायो चीता।।
आदि… कबीर दर्शन ने उन सभी वेद शास्त्रों, कुरान-पुराणों, धार्मिक ग्रंथों को मानने से इनकार किया है जिनमें मानव समाज में परंपरागत मान्यताओं को रूढ़ियों को बढ़ावा दे उनके मतानुसार सच्चा ज्ञानी तो वही है जो सबसे प्रेम कर सके क्योंकि…
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ,
पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का,
पढ़े से पंडित होय ।।
कबीरदास एक ऐसे महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि हैं, जिनका नाम भारतीय धर्म साधना के इतिहास में आज भी अग्रणीय है। जिन्होंने दीर्घकाल से जनता के जीवन का नेतृत्व किया और भारतीय जनता के पथ को आलोकित किया है।
कबीर को यदि संत के रूप में देखा जाए तो वे एक ऐसे संत थे, जिन्होंने उस समय की विपरीत परिस्थितियों में, जहाँ कुरीतियों व अंधविश्वास का बोलबाला जनता के हृदय में घर करके बैठा था, उस अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियों को हटाने का प्रयास किया। वे एक क्रांतिकारी संत के रूप में उभरकर सामने आए और समाज सुधारक बने। जिस प्रकार वर्तमान में हम कई क्रांतिकारी संतों को देखते हैं।
एक संत के रूप में कबीरदासजी ने जहाँ गुरु महिमा, निर्गुण राम में विश्वास एवं ईश्वर से साधनात्मक एवं भावनात्मक लगाव से जुड़े रहे, वहीं वे एक महान कवि के रूप में भी हमें दिखाई देते हैं।
अक्षरब्रह्म के साधक कबीरदास साधारण अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ थे। किंतु शोध एवं संदर्भ ग्रंथों के विवरण आदि में उनके द्वारा विरचित तिरसठ ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में कुछेक हैं- अगाधमंगल, अनुराग सागर, अक्षरखंड की रमैनी, अक्षरभेद की रमैनी, कबीर की बानी, ब्रह्मानिरूपण आदि। ये सभी कृतियाँ भी तो कबीर की प्रतिभा की ही रश्मियाँ हैं। निर्गुण भक्तिधारा के संतमत के सभी कवियों में कबीर सबसे अधिक प्रतिभाशाली थे। हालाँकि उन्होंने अपने विचारों को कहीं पर कुछ नहीं लिखा है। उन्हें छंद, अलंकारों का ज्ञान भी नहीं था किंतु उनकी काव्यानुभूति इतनी प्रबल थी कि वे सरलता के साथ एक ’महाकवि’ कहलाने के अधिकारी हैं।
कबीर द्वारा दिए गए संदेशों में आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, पथ प्रदर्शन तथा संवेदना की भावना निहित है। वे भावना की अनुभूति से युक्त रहस्यवादी, समाज को सुधारने वाले और मर्यादा के रक्षक कवि थे। पथ से भ्रष्ट समाज को सही दिशा देना उनका प्रधान लक्ष्य था। कवि के रूप में कबीर जीवन के अत्यंत निकट है। उनकी रचना, कला की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता एवं सहज प्रवृति है।
उनके काव्य का आधार स्व की अनुभूति या सत्य का साक्षात्कार (यथार्थ) है । वे जन्म से विद्रोही, प्रकृति या स्वभाव से समाज-सुधारक एवं धर्म-सुधारक प्रगतिशील दार्शनिक एवं आवश्यकतानुसार एक कवि हैं। उनके व्यक्तित्व का प्रतिविम्ब उनके साहित्य में विद्यमान है। कबीर का प्रतिपाद्य दो भागों में विभाजित है। प्रथम-रचनात्मक विषय, जिसके अंतर्गत सतगुरु नाम, विश्वास, औदार्य, क्षमा, संतोष आदि आते हैं। दूसरा आलोचनात्मक विषय, जिसके अंतर्गत उनकी प्रतिभ प्रकट होती है। यहाँ के आलोचक, सुधारक, पथ प्रदर्शक आदि रूपों में दृष्टिगत होते हैं। इसके विषय है- कपट, मन, माया, कामिनी आदि।
कबीर महाकवि इसलिए भी हैं कि उनकी अभिव्यंजना शैली बड़ी ही प्रभाव है। उनके द्वारा किया गया एक-एक व्यंग्य जैसे हृदय को झकझोर देता है और मन उस कुरीति से हटने का प्रयास करता है। प्रतिपाद्य के एक-एक अंग को लेकर इस निरक्षर कवि ने सैकड़ों साखियों की रचना की। जो सर्वथा मौलिक एवं अभिनवता लिए हुए है। इसलिए शायद उनके काव्य में बुद्धि तत्त्व की प्रधानता होने पर भी वह काव्य शुष्क एवं नीरस नहीं है। आत्मा, परमात्मा, जीव, जगत आदि के विवेचन के उपरांत भी कबीर ने इनके समाधान के लिए सरल भाषा, भावभवी अनुभूतियों एवं कल्पना का सहारा लिया है। कबीर के काव्य में साधनात्मक रहस्यवाद के साथ ही भावात्मक रहस्यवाद भी मिलता है। जहाँ कबीर कुंडलिनी जागृत करने जैसा कठिन मार्ग बताते हैं, वहीं जीवात्मा को ईश्वर की प्रेयसी बताकर परमात्मा रुपी प्रियतम से मिलने का सहज मार्ग भी बता देते हैं।
’दुलहिन गावहु मंगलाचार।
मोरे घर आए हो राजा राम भरतार।।’
सभी की आलोचना करने वाला कबीर इतना रसिक होगा, यह एक आश्चर्य की बात प्रतीत होती है। कबीर की कविता में कल्पना, कवित्व एवं प्रतिभा के सर्वत्र दर्शन होते हैं। उनकी कल्पनाशक्ति में व्यावहारिकता व कलात्मकता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। यह सत्य है कि काव्य रचना करना कबीर का साध्य नहीं था, किंतु अपने महान संदेशों की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें काव्य को माध्यम बनाना पड़ा। उनके काव्यत्व के लिए, हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने उन्हें ’वाणी का डिक्टेटर’ तक कहा।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तो उनकी भाषा को ’पंचमेल खिचड़ी’ भाषा बताया है। हालाँकि इस प्रकार संत कबीर एक क्रांतिकारी संत एवं समाज-सुधारक होने के साथ ही भावप्रवण एवं महाकवि भी थे।

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