गीत: पंडित जगदीश त्रिपाठी


दुश्मन से ज्यादा अपनों से अब सावधान रहना होगा!
कुछ दुस्ट और मंकारों से बचकर के रहो कहना होगा!!
कुछ करके दिखाना ही होगा कोई किसी का यहां नहीं!
फल कर्मो का तो मिलना है जो कष्ट मिले सहना होगा!!
जख्म पर ही जख्म जाने क्यों अपने हमेशा मिल रहा!
फूल खुशियों का यहाँ नहीं आंगन में सबके खिल रहा!!
रिश्ते नाते प्यार वफ़ा कुल खानदान सब मतलब के हैं!
जख्म अपने हाथसे अपना यहां है कैसे कोई सिल रहा!!
भरा हो पेट मौसम क्या संसार संसार सुहाना लगता है!
लगीहो भूख तो मुश्किल यहांपे ईमान बचाना लगता है!!
जिनके लिए मिटाया खुद को अब उनका यह आलम है!
वो बीस पचीस वर्ष जीवन के अब व्यर्थ गवना लगता है!!
अपने तो प्रारब्ध है ऐसे जीवन सारा कांटों मेंही जीना है!
ये इतने सारे जख्म मिलेहैं हर रोज खुद हाथोही सीना है!!
है आज नहीं तो नहीं सही कल अपना समय भी आएगा!
हरकर्मों का फल निश्चितहै यहांपर काशी व्यर्थ मदीना है!!
सच्चे इंसानों को जग में असहनीय दुख पाना होगा!
सूली पर चढ़ गए मसीहा राम को बन में जाना होगा!!
नानक बुद्ध कृष्ण औ ईशा किसने कष्ट को कहा नहीं!
मीरा औ सुकरात को कैसे बेहतर जहर पिलाना होगा!!
अब कानून बनाकर चक्कर सुप्रीम कोर्ट लगाते है!
मौका मिला हुआ है जिसको वही लूट कर खाते हैं!!
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई बौध पारसी जैन यहांपर!
बेमतलब आपस में झगड़ा कुछलोग यहां लगवाते हैं!!
मानवता का कत्ल करे जो धर्म मझै वह नहीं चाहिए!
जियो और जीनेदो सबको हिंसा कहींभी नहीं चाहिए!!
गलत यहां दिख रहा सामने है कहने वाला कोई नहीं!
ऐसे लोगों से फिर मतलब ज्यादा रखना नहीं चाहिए!!


रचना पंडित जगदीश त्रिपाठी

गीत कार व पत्रकार
आजमगढ़ उत्तर प्रदेश

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