ग़ज़ल: जगत भूषण राज

ग़ज़ल
बात बनाना. खूब रहा है ।
गाल बजाना खूब रहा है ।।
हुस्ने मतला
मिलकर जाना खूब रहा है ।
दर्द बढ़ाना …..खूब रहा है ।।

वादा करके …हमसे जानम ,
तेरा आना …….खूब रहा है ।।

तिरछी तिरछी. नज़रों से ,
तीर चलाना खूब रहा है ।।

अपने आशिक पर यूँ तेरा ,
प्यार लुटाना खूब रहा है ।।

सुबह सवेरे शाम दोपहर.,
यूँ तड़पाना .खूब रहा है ।।

ख्वाब सजाके इन आँखों में
चैन चुराना …..खूब रहा है ।।

दाँतो तले… दबाके अँगुली ,
शरमाना भी ….खूब रहा है ।।

स्वरचित व मौलिक
जगत भूषण राज
बिहार

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