जीवन गर होता सरल
कठिनाइयों का नहोता गरल
सुख ही होती सबको आस
दुख का कहीं न होता निवास
सब करते सबका विश्वास
सब कुछ विकसित होता
सबका एक सा होता विकास
सब नर नारायण दिखते
न होता कोई नर राक्षस
न चीर हरण न सीता हरण
न वनवास दशरथ मरण
न राम रावण युद्ध
न लंकादहन न रावण वध
न महाभारत लिखी जाती
न रामायण की रचना होती
सोचो
कैसे अधर्म के साथ
धर्म केलिये लड़ते झगड़ते
हम सत्ते के लिए
एक एक वोट केलिए
लाठी डंडा बम गोली लेकर
कैसे बहाते
खून नदियां
रह जाते
इस जनम मे
प्यासे की प्यासे
रहते हम लोगो के खून के प्यासे
सत्ता न पाते न सिंघासन
होते सीधे साधे
सबको आपस में बताते
दूर रहें करो दूर सब विकार
सादा जीवन उच्च विचार
** अरविन्द मालवीय मालवीयनगर इलाहाबाद
चित्र संयोजन अरविन्द मालवीय