बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब: पागल फ़क़ीरा

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212

क्यूँ अजनबी को राज़ बताता चला गया,
मेरी ग़ज़ल मुझे ही सुनाता चला गया।

अब हाल दिल का कौन सुनेगा यहां मेरा,
हर बार ज़ख्म ज़िस्त को खाता चला गया।

क्या बज़्म में भी राज़ से पर्दा उठा नहीं,
बर्बादियों का दौर भुलाता चला गया।

क्या राज़ है बता दे मुझे तेरी बात में,
मेरी ग़ज़ल में नाम तो आता चला गया।

महफ़िल हुई है चाँद सी रोशन जो प्यार की,
ये हुस्न तेरे नाम सताता चला गया।

क्या गीत क्या ग़ज़ल तू लिखेगी ए ज़िन्दगी,
मैं रात भर यूँ लफ़्ज़ बनाता चला गया।

है नाम तेरे दिल में फ़क़ीरा छुपा कहीं,
सारी ख़ुशी वो होंठ पे लाता चला गया।

✍🏼’पागल फ़क़ीरा’✍🏼

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