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यहाँ वर्जित वेदनायें हो गईँ हैं,
कैसी कलुषित हवायें हो गईँ हैं।
राजनीति के कीट पतंगों की,
प्रदूषित मानसिकताएं हो गईँ हैं।।1।।
विरह के गीत पे पाबंदियां हैं,
प्रतिबंधित प्रतीक्षायें हो गईं हैं।
दर्द में तड़पना अब मना है,
शून्य सारी संवेदनायें हो गई हैं।।2।।
इश्क पर यहाँ पहरा हुआ है,
गायब सारी वफायें हो गईं हैं।
प्रीत के गीत कोई गाता नहीं,
प्राथमिक वासनायें हो गई हैं।।3।।
फ्लाइंग किस भी मुश्किल में है,
इस दौर में जहरीली हवायें हो गई हैं।
रोग का उपचार कोई कैसे करे,
पहुंच से अब बाहर दवाएं हो गई हैं।।4।।
हाथ तो यहाँ मिलते नहीं हैं
फिर भला दिल कोई कैसे मिलाये।
साम्प्रदायिकता के इस दौर में,
गहरी मजहब की रेखायें हो गई हैं।।5।।
आओ मिल दुश्मन को डरायें,
करें शुरु जो बन्द यात्राएं हो गई हैं।
आतंक को और कुचलना है अभी,
माना काफी सजायें हो गई हैं।।6।।
नफरत से हैं फूल खिलते नहीं,
कुण्ठित सारी भावनाएं हो गईं हैं।
सच्चे दिल से भक्ति करते नहीं,
निष्फल सभी प्रार्थनायें हो गई हैं।।7।।
देर है पर वो अंधेर करता नहीं,
अब अन्याय की सीमायें हो गई हैं।
वक्त का पहिया जब चलेगा यहाँ,
देखना पूरी सब कामनाएं हो गई हैं।।8।।
आतंक के अड्डे चलाता है पडोसी,
ध्वस्त उसकी आकान्क्षायें हो गई हैं।
सिन्दूर माथे का था जिसने मिटाया,
उनको तो मृत्यु की सजायें हो गई हैं।।9।।
शौर्य जवानों ने दिखाया युद्ध में,
वो तो इतिहास की गाथायें हो गई हैं।
हम शान्ति दूत,शान्ति के उपासक,
युद्ध में भी वैदिक ऋचायें हो गई हैं।।10।।
श्रीपति रस्तोगी,लखनऊ
9721388339