तुम हो: कृत्या नंद झा अमृत

तुम हो…

मेरे विश्वास का आधार तुम हो
मेरे चमत्कृत शब्द के भंडार तुम हो l

मेरी रचनाओं के सृष्टि द्वार तुम हो
उसमें बसे भाव के भावार्थ तुम हो l

मेरे नव जीवन की शुरुआत तुम हो
अमृत तू हो तो जीवन के रसधार तुम हो l

मेरे आँखों की पानी तुम हो
जीवन के उत्कर्ष की कहानी तुम हो l

मेरे जीवन निर्झर में तुम हो
मेरे वाणी के अतल में तुम हो I

मेरे सफलता का आगाज तुम हो
मेरे परिश्रम का अंजाम भी तुम ही हो l

मेरे कविता का श्रृंगार तुम हो
सर्वस्व तू क्या कहूँ खुद से
जीवन की झंकार भी तुम हो
संस्कार भी तुम ही हो l

रचना: कृत्या नंद झा अमृत
राँची
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

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