"प्रकृति और हम"
प्रकृति से ही हम हैं , हम से है ये प्रकृति ,
इस की रक्षा करना, होनी चाहिए प्रवृति ।
नदी को कहते हैं मैया, पर्वत को मानते पिता तुल्य ,
नदी हमें देती है पानी , पर्वत देते हैं खनीज अमुल्य ।
तुलसी का पावन पौधा है , घर घर की शोभा बढ़ाता ,
पीपल-बरगद वृक्ष भी है, सनातनियों से पूजा जाता ।
गाय को गौमैया हैं कहते, गौमुत्र का आचमन हैं करते ,
सर्प को भी देव मानकर , नागपंचमी पर दूध हैं धरते ।
सूरज के अधर्य से, सुबह की हम शुरूआत हैं करते ,
शिवलिंग पर भी जलाभिषेक करके पूजन हैं करते ।
नारी को भी दैवी – शक्ति मानकर हम सम्मान हैं देते ,
बड़े – बुज़ुर्गों के भी चरण छूकर, हम आशीष हैं लेते ।
प्रकृति हम में है समाई , हम भी समाए हैं प्रकृति में,
बड़ा ही आनंद आता है हम को, इस की प्रवृति में ।
— गोविन्द रीझवाणी ” आनंद “_✍️
सुरत ( गुजरात )