हंसी छीन लेता है गम कोई”….
कभी साँझ की चुप्पी में चुपचाप आकर,
हँसी छीन लेता है ग़म कोई।
बिना आहट, बिना दस्तक के,दिल के आँगन में बस जाता है भ्रम कोई।
जिसे अपना समझा उम्र भर हमने,
वही सबसे गहरा ज़ख़्म दे गया।
जो साथ निभाने की कसमें खाता था,
वो भी रिश्ता अधूरा कर गया।
कभी लफ़्ज़ों में दर्द छुपा रहता है,
कभी नज़रों से बयां हो जाता है।
जो मुस्कान हुआ करती थी कभी अपनी,अब बस यादों में कहीं खो जाता है।
फिर भी जीते हैं, टूटकर भी,उम्मीद की डोर थामे रहते हैं।
क्योंकि हर ग़म के बाद इक सुबह आती है,
और हम फिर से मुस्कुराना सीख जाते हैं।
प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या
पालमपुर हिमाचल प्रदेश