पागल: अभिलाषा श्रीवास्तव


वह रोजर्मरा में
संबोधित होती स्त्रियों ने कपड़े मोजा स्वेटर सभी को सहेज़ के रखा अगर ना रख सकी तो वो था उनका रिश्ता
अकुलाहट के बीचोबीच जब भी संवेदना पनपने आंगन में बीचोबीच दूजी स्त्री के द्वारा संबोधित पागल नाम से होती
कोई तगमा कोई मैडल या कोई उपनाम नहीं बल्कि उसके आत्मा को चोटिल कर के मानसिकता का दोहन होता
अरे कभी किसी ने देखा है क्या पागल स्त्री रोते हुए भी रसोई के ताप पे कुशल नेतृत्त्व करतीं नजर नहीं आती है फिर क्यों पागल कह के अक्सर बुलाई जाती है कोने में रोती बिलखती वह स्त्री बस इतना ही बोल पाती है आखिर बेटी किसी भी आंगन में पागल नाम से संबोधित क्यों नहीं होती है।

अभिलाषा श्रीवास्तव गोरखपुर।

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