तंबाकू: अवधेश कुमार श्रीवास्तव

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

रुको! क्यों खा रहे गुटका, निमंत्रण मौत को देते,
जलाते खुद का सीना हो,कश सिगरेट का क्यों लेते,
जिंदगी प्यारी नहीं बिल्कुल,दे रहे मौत को दावत,
मिलता क्या तंबाकू से,मुफ्त में प्राण क्यों देते।।

जहर जो ले रहे तुम हो,लिखी चेतावनी उस पर
सब साफ़ पढ़ लेते,मगर लेते हो फिर क्यों कर
काश जल्दी है मरने की,जरा सोचो जो आश्रित हैं
छोड़कर जा रहे हो तुम इन्हें कि,के,सहारे पर।।

सिगरेट तंबाकू खैनी सब निश्चय ही जहर है धीमा
मांग मांग कर खाते हो, फिर लांघने लगे हो सीमा
कमाई सभी इसमें उड़ जाती,रोटी के पड़ेंगे लाले
आ गये गिरफ्त में कहीं रोग के,काम न आएगा बीमा।।

इसलिए विनय है भाई मेरे,दो छोड़ इसी पल धूम्रपान
कर लो कुल परिवार सुरक्षित,बचा के अपने प्राण
हो गई बंद गर आंख तुम्हारी,दर दर भटकेगे आश्रित तेरे
भीख मांग रहा उनकी खातिर दे दो खुद को जीवन दान।

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