निस्वार्थ प्रेम: डॉ. उषा अग्रवाल जलकिरण

……..निस्वार्थ प्रेम…..

प्रेम सदा निस्वार्थ किया था मीराबाई ने,
विष को अमृत तभी किया था कन्हाई ने।

प्रेम प्रदर्शन नही ये तो भाव में छिपा होता,
न कहता है कुछ न कभी कुछ मांगता होता।

राधा कृष्ण का प्रेम निस्वार्थ ही रहा जग में
राथा कृष्ण नाम सदा रटता रहा जीवन में।

निस्वार्थ प्रेम में टूटकर रुह में डूब जाते हैं,
कुब्जा के चंदन का मोल कान्हा दे जाते हैं।

निस्वार्थ प्रेम किया था नरसी ने कान्हा से
नानी बाई का भात भरा भाई बन कान्हा ने

जिसने जो मांगा उसे दिया था कान्हा ने
नरसी की लाज बचाने भात भरा कान्हा ने।

जब लगन हो मीरा जैसी तोकान्हा हैं आये,
निस्वार्थ प्रेम शबरी का तो राम कुटियाआये।

आंखों में आंसू भरकर भी जो टेर लगाते हैं
उसके दुखों को दूर करने कान्हा चीर बढ़ाते हैं।

‌‌ डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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