विषय यादों का समंदर: प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

लहरों सी उफनती हैं कुछ यादें मेरी तुम्हारी,
सन्नाटों में भी गूंजती हैं वो हँसी की तनहाई गहरी।

बीते लम्हों की बूँदें जब मन के तट पर गिरतीं,
भीग जाती हैआत्मा,जैसे बरसों बाद , घटा उमड़ घुमड़ आती।

हर तस्वीर, हर याद, एक कहानी कहती है,
कभी धूप में छाँव सी, कभी बारश सी बहती है।

ना जाने कितनी बार डूबी हूं इस यादों के समंदर में,
पर ये समंदर उलझा रहता सदा पुराने पलों के बवंडर में।

कुछ आँसू, कुछ मुस्कानें, कुछ अधूरी सी ख्वाहिशें,समेटे बैठा है ,
यह समंदर अपनी खामोशियों में।
दिखती रहती हैं हरदम मुझे ये सीप के मोतियों में।

मैं जब-जब आँखें बंद करती हूँ, लहरें छूने को आती हैं,
बीते पलों की परछाइयां फिर से मुझे बुलाती हैं।

प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

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