तेरे बेवफाई पर हम मुस्कुराते रहे
तेरी मजबूरियों से खुद को बहलाते रहे।।
जब तक साथ थी वो, परछाई थी मेरी
अब दूर से ही यादों में शोर मचाते रहे।।
इश्क़ होता है पूजा, इसे सबको बताते रहे
कुछ इस तरह अंधेरों से अदावत बनाते रहे।।
ख़ुद को जला उसका गुलशन रोशन किया।
उजाले वास्ते दीपक ख़ुद को मिटाते रहे।।
मेरी तन्हाई को आईना बताता नहीं है अब
ये भी दाएं को बाएं बता मुझे भरमाते रहे।।
निगार ए बहार तू अब भी ऐसी ही है
तेरी खुशी को ही मन्नतों से सजाते रहे।।
त्याग से ही इश्क़ मुक्कमल होता है पूरब
सुबह तक अंधेरों को ये बात समझाते रहे।।
पूरब
कुन्दन वर्मा “पूरब”