चलो हम वृक्ष लगाऍं
बढ़ता तापमान
विधा –रोला छंद
तृषित हुए वन बाग, धरा में पड़ी दरारे।
सूखे कूप-तड़ाग, गाॅंव के सभी हमारे।।
कहीं नहीं है छाॅंव, नहीं दिखती हरियाली।
जीव सभी बेहाल, नहीं अब है खुशहाली।।
मौसम की है मार, झेलते सारे प्राणी।
मौन हुए लाचार, बंद है सबकी वाणी।।
मौसम है प्रतिकूल, सम्हालें इसको कैसे।
सूरज देता ताप, नित्य अंगारों जैसे।।
देख रहा इंसान,मगर कुछ समझ न पाया।
वृक्षों को वह काट,धरा का ताप बढ़ाया।।
शीतल नहीं समीर, धरा पर अब बहती है।
प्रकृति हुई नाराज,सभी से कुछ कहती है।।
पर्यावरण सुधार, कार्य सबको है करना।
धरती पर खुशहाल,अगर हमको है रहना।।
चलो शपथ लें आज, सभी हम वृक्ष लगाऍं।
करके यह शुभ कर्म, धरा का कर्ज चुकाऍं।।
रचयिता
रामसाय श्रीवास ‘राम’ किरारी बाराद्वार
सक्ती (छग)