ग़म: देवेंदर सिंह गुड्डू


मल मल अंखिया. धोया हूं
अंसुवन से रैन भिगोया हूं
जाने किसकी याद सताई
हे आज बहुत मैं रोया हूं

जाने क्या होने वाला है
सब-कुछ ऊपर वाला है
कुक्कुर निंदिया सोया हूं

साए ने दामन छोड़ दिया है
अपनों ने मुँह मोड़ लिया है
किस उम्मीदों में खोया हूं

रह रह आती याद तुम्हारी
रुकरुक जाती साँस हमारी
अरमानों के… …. धागों में
मैं कैसा ….पुष्प पिरोया हूं

दिल से जिसको चाहा था
जिससे खुशियां ..मांगा था
पीछे-पीछे. . . .. भागा था
ग़म आज उसी का ढोया हूं
Swarchit devendra singh guddu

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