टुटने के खौफ़ से दिल शीशे के सदा नहीं रखते
संग-ए- बूत बे-ज़ुबां हो तो ऐसे खुदा नहीं रखते
( खौफ़ ~ डर ,संग ए बूत ~ मुर्ती पत्थर की )
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बहुत अंधेरा पसरा है तेरे न आने से ऐ दोस्त
चंराग- ए -रोशन कब्र का कभी तन्हां नहीं रखते
( चिराग़ ए रोशन ~ जलता दीप, तन्हां ~ अकेला )
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हम बे – शक़ फकीर है प सरफराज़ नहीं रखते
टुटने का ग़र अंदेशा हो तो हम अश्ना नहीं रखते
( सरफराज़ ~ अंहकारी, अश्ना ~ दोस्त )
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मरज़ ला – इलाज तो मर जाना ही बेहतर होगा
जिंदगी ज़हर सी है तो खुदाया दवा नहीं रखते
( मरज़ ~ रोग )
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मुनफ़रीद खमीर भी न उठता है मेरे मि’आर का
ऐसा कौन जो वक्ते-संग हिर्स-ओ-हवा नहीं रखते
( मुनफ़रीद ~ पुख़्ता ,मि’आर ~ स्तर,हिल्स ओ हवा ~ लोभ और लालच )
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मय-क़शो जरा चश्म-ए-लुफ़्त-ए-शराब का भी हो
इस दिल के वो मालिक है उनको ख़फ़ा नहीं रखते
( मय-कश ~ शराबी ,ख़फ़ा ~ नाराज़गी )
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नज़र न आती है ” मीर ” खुश- खिसाल तेरे चेहरे से
यु जुल्फ़ रूखसारो प रख बातिले – अदा नहीं रखते
( खुश-खिसाल ~ स्वाभाविक खुश होना, बातिल~ झुठी )
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~ दिलीप वर्मा ‘मीर’ ( मीर आलमग़ीर )
आबूरोड़ जिला -सिरोही राजस्थान में