मन के भाव: अवधेश कुमार श्रीवास्तव

मन के भाव

स्वरचित मौलिक रचना
अवधेश कुमार श्रीवास्तव

भाव हमारे सुंदर हों तो शब्द स्वत: सुंदर उभरेंगे,
हृदय वाटिका मधुरिम हो तो काव्य पुष्प खुद ही महकेगे,
जिज्ञासा शांत तभी होगी,गर लिखते काव्य समर्पण संग
छाप अवश्य छोड़ेगी कविता,पढ़कर मन सबके चहकेंगे।।

मेरा तो विश्वास अटल,जो लिखता,होता ग्राह्य सभी को,
सर्वमान्य हों सटीक उदाहरण पढ़ना तो होता भाष्य सभी को
स्थिति और परिस्थिति लिखता,लिखता देश दुर्दशा मैं
मातु पिता वृद्धाश्रम में, पकवान परोसें अनजान सभी को।।

पाला-पोसा जिन हाथों ने,वह हाथ ही रोटी ढूंढ़ रहे,
कहें व्यथा निज खून की किस्से,कौन किसे पूंछ रहे
मानवता शब्द डिक्शनरी तक,मूल्य नेह का रहा नहीं,
मन करे कभी लूं मिल बेटे से,पता नहीं पर पूंछ रहे।।

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