आशना दसाडिया भावनगर (गुजरात)
नारी — ज्वालामुखी की गर्भ से जन्मी अग्नि
उसके जन्म पर शोक मनाया, जैसे कोई शाप समाया हो,
पर वही किसी दिन भाग्य बना, अभिज्ञान बनकर छाया हो।
बचपन से उसको सिखलाया, झुकना, सहना, चुप रह जाना,
पर उसकी आत्मा में विद्रोह, जन्मजात ही था आना।
हर सपना उसका पिंजरा था, जो हर रोज़ उसे डराता था,
पर उसी पिंजरे से उसने, अपने पंख तराशा था।
तूने उसकी हँसी दबाई, और उसकी उड़ान को तोड़ा,
मगर तू उसकी अग्नि बुझा ना सका, जितना भी उसको रोका।
‘इज़्ज़त’ और ‘मर्यादा’ की जो ज़ंजीरों से बाँधा जाता,
वहीं हथियार बना नारी ने, और न्याय का गीत गाया।
तूने समझा नारी केवल सेवा और समर्पण की मूरत,
मगर तू भूल गया वो ज्वाला है, चेतना की वह सूरत।
हर चुप्पी अब प्रश्न बन चुकी, हर आँसू में ज्वार उठा,
तेरे सारे जवाब थके हैं, सत्य के आगे हार गया।
उसने इतिहास नहीं माँगा, बस समय का रुख मोड़ा है,
जिसने दुनिया से तट तोड़े, उसने सागर को जोड़ा है।
जिस बेटी को तूने छोड़ा, डर से छाया में सुला दिया,
आज वही तूफ़ानों की आँख बनकर ज्वाला बन गई है।
समाज के झूठे आदर्श अब, उसके पैरों की धूल हुए,
उसकी आँखें बस आकाश में, नये सूरज की खोज लिए।
न ज़िंदा रहने की भीख उसे, न इज़्ज़त की कोई दुआ,
अब वो सिर्फ़ नहीं माँगती न्याय — माँग रही है क्रांति खुला।
तू सोच रहा था वो बुझेगी, पर वो राख नहीं, वो आग है,
तू उसी में छिपा हुआ डर है, और उसका साहस जाग है।
वो अब न ज़िंदा रहने की भीख माँगती है, न इज़्ज़त की दुआ
वो अब सिर्फ न्याय नहीं, क्रांति माँगती है।
तू सोचता था, वो मिट जाएगी
मगर सच ये है कि, तू उसकी राख में दबा हुआ डर है।
अब नारी कहानी नहीं, क़यामत है
जो चुप रही तो धधकेगी, और बोलेगी तो जला देगी।
आशना दसाडिया
भावनगर (गुजरात)