आकाशगंगा,और वह शख़्स
जो चला गया उत्तुंग शिखर पर
खुद ही से पराजित होकर
यह सब एक पूर्णांक है
मैं अखिल सृष्टि को सोचता हूं
एक महीन माइकोप्लाज़्मा
जो लिपटा हुआ है एक छोटे
काईलोमाइक्रोन के झिल्ली में
रक्तलोचन पुरुष,रोमछिद्र त्वचा
लोमहर्षक लम्हें,उन्मादी सांसे
गोनाड्स में बहता टेस्टोस्टेरोन
सब प्रलय को चूमते है
एक उच्छवास पुनः नहीं लौटे तब।
अखिल नभमंडल बैक्टीरिया है
जो चलायमान है सिर्फ़
एक सांस लेने एक छोड़ने के लिए
यह जीनस घूम रहा है
एक दीर्घकाय मानुष के भीतर
जो अनभिज्ञ है इस चराचर से।
ये डायनासोर भी लुप्त हो गए
टकराकर उल्का पिंड से
क्या अस्तित्व इस मानव तन का
हृदयाघात ही ले जाता परलोक।
यह कोरोना,यह विभीषिकाएं
वह अखिल पेलोयोजिन काल
यह सब महज नतीजा है
उस दीर्घकाय होमो सेपियंस के
कच्ची चपाती खा लेने के।
मैं समझता हूं पृथ्वी,मंगल,वरुण
यह सब महज़ शून्य है।
विभिन्न मंडल,परत नहीं बचा पाएंगे
सृष्टि के संहार को।
दिनेश विश्नोई जोधपुर